350 दिन की देरी से दायर अपील खारिज, हाईकोर्ट ने कहा- देरी माफ करना अपवाद है, अधिकार नहीं
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की वह अपील खारिज कर दी, जो निर्धारित समय-सीमा के 350 दिन बाद दायर की गई थी। जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि देरी माफ करना अपवाद है, इसे अधिकार के रूप में नहीं लिया जा सकता।
यह मामला कोरबा जिले के सिविल लाइन रामपुर थाना क्षेत्र के एक अपराध से जुड़ा है। विशेष न्यायालय (पॉक्सो), कोरबा ने 1 मई 2024 को आरोपी मोहम्मद मुस्तफा को भारतीय दंड संहिता की धारा 354 और पॉक्सो अधिनियम की धारा 8 के तहत आरोपों से बरी कर दिया था। इस निर्णय के विरुद्ध राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में अपील दायर की, जो विधि सम्मत अवधि के 350 दिन बाद प्रस्तुत की गई, साथ ही देरी माफी का आवेदन भी लगाया गया।
राज्य सरकार के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि विभागीय प्रक्रियाओं, फाइलों के आदान-प्रदान और सरकारी कामकाज की जटिलता के कारण यह देरी हुई। यह भी कहा गया कि ट्रायल कोर्ट का फैसला त्रुटिपूर्ण है और साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि केवल विभागीय प्रक्रिया या फाइलों के आदान-प्रदान को देरी का पर्याप्त कारण नहीं माना जा सकता। सरकार को भी अन्य पक्षों की भांति समय-सीमा का पालन करना अनिवार्य है। बिना ठोस एवं संतोषजनक कारण के इतनी लंबी देरी को क्षमा नहीं किया जा सकता। अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि देरी माफी कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं, बल्कि अपवाद है।
