दो साल बाद मां-बेटों का भावुक मिलन: विधिक सेवा प्राधिकरण की पहल से लौटी परिवार की खुशियां

महासमुंद। परिवारिक कलह के कारण घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हुई 70 वर्षीय लच्छनी बाई की जिंदगी में आखिरकार खुशियों ने फिर दस्तक दी। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण महासमुंद की संवेदनशील पहल से करीब दो वर्ष बाद उनका अपने बेटों से भावुक पुनर्मिलन हुआ। मां-बेटे के इस मिलन ने वहां मौजूद सभी लोगों की आंखें नम कर दीं।
राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) के ‘करूणा’ एवं वरिष्ठ नागरिक अधिकार सशक्तिकरण अभियान के तहत जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की प्रभारी सचिव एवं मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सुश्री चेतना ठाकुर ने आशियाना वृद्धाश्रम में आयोजित विधिक जागरूकता शिविर के दौरान वरिष्ठ नागरिकों से संवाद किया। इसी दौरान ग्राम सेवईया (थाना पिथौरा) निवासी लच्छनी बाई ने अपनी दर्दभरी कहानी साझा की।
लच्छनी बाई ने बताया कि तीन बेटों के बीच लगातार विवाद और पारिवारिक तनाव से आहत होकर उन्होंने स्वयं घर छोड़ दिया था। भटकते हुए उन्हें आशियाना वृद्धाश्रम का सहारा मिला, जहां वे पिछले दो-तीन वर्षों से रह रही थीं।
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुश्री चेतना ठाकुर ने अधिकार मित्र जितेंद्र पटेल के माध्यम से उनके परिजनों का पता लगवाया और उन्हें जिला विधिक सेवा प्राधिकरण कार्यालय बुलाया। वहां बेटों और पुत्रवधुओं को माता-पिता के प्रति उनके दायित्वों की जानकारी देते हुए मां की देखभाल, सम्मान और स्नेहपूर्ण व्यवहार का महत्व समझाया गया।
समझाइश का सकारात्मक परिणाम सामने आया और लच्छनी बाई के बेटे तथा पुत्रवधुएं उन्हें अपने साथ घर ले जाने के लिए सहमत हो गए। वर्षों बाद मां और बेटों के मिलन का दृश्य बेहद भावुक रहा। वृद्ध मां की आंखों में खुशी के आंसू थे तो परिवार के सदस्य भी भावनाओं से भर उठे।
इस अवसर पर ठाकुर राम दीवान, अधिकार मित्र हरिचंद साहू, आशियाना वृद्धाश्रम की रूचि ठाकुर, भूमिका ध्रुव, साध्या तांडी तथा लीगल एड डिफेंस के कर्मचारी खेलसिंह पटेल भी उपस्थित रहे।
मानवीय संवेदनाओं की मिसाल
जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की यह पहल केवल एक वृद्ध महिला को उसके परिवार से मिलाने तक सीमित नहीं रही, बल्कि समाज को यह संदेश भी दिया कि संवाद, संवेदना और समझदारी से टूटते रिश्तों को फिर जोड़ा जा सकता है

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