बंधुआ मजदूरी से आज़ादी, शिक्षा से नई उड़ान: 13 बैगा बच्चों की जिंदगी में लौटी मुस्कान

रायपुर, 24 जून 2026। छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की संवेदनशील पहल और सतत निगरानी ने 13 बैगा आदिवासी बच्चों के जीवन में नई उम्मीद जगाई है। कभी बंधुआ मजदूरी और शोषण का शिकार बने ये बच्चे आज फिर से स्कूल की चौखट तक पहुंच चुके हैं और अपने सपनों को नया आकार देने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।

कबीरधाम जिले के भोरमदेव क्षेत्र के थुहापानी गांव तथा कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के आसपास स्थित पशुपालन फार्मों में मई 2026 में मानव तस्करी और बाल श्रम का एक गंभीर मामला सामने आया था। विशेष पिछड़ी जनजाति (PVTG) बैगा समुदाय के 8 से 15 वर्ष आयु वर्ग के 13 बच्चों को कथित रूप से आर्थिक प्रलोभन देकर उनके परिवारों से दूर ले जाया गया था, जहां उनसे मवेशी चराने सहित विभिन्न कार्य कराए जा रहे थे। बच्चों से सुबह से देर रात तक काम लिया जाता था और उन्हें न तो उचित मजदूरी मिल रही थी और न ही आवश्यक सुविधाएं।

मामले की जानकारी मिलते ही कवर्धा पुलिस, महिला एवं बाल विकास विभाग, चाइल्डलाइन और एसोसिएशन फॉर वॉलंटरी एक्शन (AVA) ने संयुक्त अभियान चलाकर सभी बच्चों को सुरक्षित रेस्क्यू किया। इस मामले में पुलिस ने दो मानव तस्करों और छह नियोक्ताओं सहित कुल आठ आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई भी की।

घटना के बाद छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए बच्चों के पुनर्वास, सुरक्षा और शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा के निर्देश पर संबंधित विभागों से लगातार समन्वय किया गया और यह सुनिश्चित किया गया कि बच्चों को दोबारा किसी प्रकार के शोषण का सामना न करना पड़े।

आयोग के निर्देशों के अनुरूप विकासखंड शिक्षा अधिकारी, बोड़ला द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार रेस्क्यू किए गए सभी 13 बच्चों का पुनः विद्यालयों में प्रवेश करा दिया गया है। साथ ही उन्हें आवश्यक शैक्षणिक सुविधाएं उपलब्ध कराने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है, ताकि उनकी पढ़ाई बिना किसी बाधा के जारी रह सके।

इस उपलब्धि पर डॉ. वर्णिका शर्मा ने कहा कि हर बच्चे का बचपन, शिक्षा और सुरक्षित भविष्य उसका मौलिक एवं संवैधानिक अधिकार है। बंधुआ मजदूरी और मानव तस्करी जैसी अमानवीय घटनाओं के लिए सभ्य समाज में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि इन बच्चों की स्कूल वापसी केवल औपचारिक प्रवेश नहीं, बल्कि उनके आत्मसम्मान, अधिकारों और उज्ज्वल भविष्य की पुनर्स्थापना है।

यह पहल न केवल 13 बच्चों के जीवन में बदलाव की कहानी है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि संवेदनशील प्रशासन, सक्रिय कानून व्यवस्था और सामूहिक प्रयासों से बच्चों को शोषण से मुक्त कर शिक्षा और सम्मानजनक जीवन की राह पर आगे बढ़ाया जा सकता है।

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