औपचारिक नामों से अपनत्व की ओर बढ़ते बाल गृह, स्थानीय और प्रेरणादायक नामों के लिए आयोग की नई पहल
बाल संरक्षण संस्थाओं की बदलेगी पहचान, बच्चों में आत्मसम्मान और अपनत्व जगाने 21 सितंबर तक मांगी रिपोर्ट
रायपुर, छत्तीसगढ़ में संचालित बाल एवं बालिका संरक्षण गृहों और बाल संप्रेक्षण गृहों की पहचान अब और अधिक सकारात्मक, प्रेरणादायक और बच्चों के अनुकूल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की गई है। छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने इन संस्थाओं के नामों में बदलाव को लेकर महिला एवं बाल विकास विभाग को पत्र लिखा है।

आयोग का उद्देश्य केवल संस्थाओं के नाम बदलना नहीं, बल्कि वहां रहने वाले बच्चों के मन में अपनत्व, आत्मसम्मान, सुरक्षा और सकारात्मकता की भावना को मजबूत करना है।
बच्चों के मनोभाव पर पड़ता है नामों का प्रभाव
डॉ. वर्णिका शर्मा ने कहा कि किसी भी संस्था का नाम उसकी पहचान के साथ-साथ उससे जुड़े बच्चों की सोच और मनोभाव पर भी प्रभाव डालता है। ऐसे में बाल संरक्षण गृहों की पहचान ऐसी होनी चाहिए, जिससे बच्चों में हीनभावना के बजाय सम्मान और आत्मीयता की भावना विकसित हो।
आयोग ने जम्मू में बाल संरक्षण संस्थाओं के लिए प्रचलित ‘पलाश’ और ‘परिषा’ जैसे सकारात्मक नामों का उदाहरण देते हुए छत्तीसगढ़ में भी इसी प्रकार के गरिमापूर्ण और प्रेरणादायक नाम अपनाने की अनुशंसा की है।
स्थानीय संस्कृति और प्रकृति से जुड़े होंगे नए नाम
आयोग ने सुझाव दिया है कि जिलों में संस्थाओं के नए नाम तय करते समय स्थानीय भाषा, संस्कृति, प्रकृति, लोक परंपरा और क्षेत्रीय पहचान को प्राथमिकता दी जाए।
इससे न केवल संस्थाओं को नई पहचान मिलेगी, बल्कि बच्चे भी अपनी संस्था और स्थानीय संस्कृति से अधिक आत्मीय रूप से जुड़ सकेंगे।
बच्चों और देखरेखकर्ताओं से भी लिए जाएंगे सुझाव
नामकरण की इस प्रक्रिया में बाल संरक्षण गृहों में रहने वाले बच्चों, देखरेखकर्ताओं और अन्य संबंधित हितधारकों के सुझाव भी लिए जाएंगे।
आयोग का मानना है कि जब बच्चे स्वयं अपनी संस्था की नई पहचान तय करने की प्रक्रिया में शामिल होंगे, तो उनके भीतर उस स्थान के प्रति अपनत्व और जुड़ाव की भावना और मजबूत होगी।
21 सितंबर तक मांगी गई कार्रवाई रिपोर्ट
छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने महिला एवं बाल विकास विभाग से आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर जिलों से प्रस्तावित नामों की सूची प्राप्त करने का आग्रह किया है।
साथ ही इस संबंध में की गई कार्रवाई की विस्तृत जानकारी आयोग को 21 सितंबर 2026 तक लिखित रूप में उपलब्ध कराने को कहा गया है।
बच्चों के सुरक्षित और सम्मानजनक भविष्य की दिशा में कदम
आयोग की यह पहल बाल संरक्षण संस्थाओं को केवल प्रशासनिक व्यवस्था के रूप में देखने के बजाय उन्हें बच्चों के सुरक्षित, सम्मानजनक और सकारात्मक विकास के केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
उम्मीद है कि बाल गृहों की नई और सकारात्मक पहचान बच्चों की सामाजिक छवि को बेहतर बनाने के साथ-साथ उनके आत्मविश्वास और भविष्य को भी नई दिशा देगी।
