धर्मांतरितों और पादरियों के प्रवेश निषेध के खिलाफ याचिका सुप्रीम कोर्ट में खारिज, ग्राम सभाओं की हुई बड़ी जीत

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के ग्राम सभाओं द्वारा गांवों में ईसाई पादरियों और धर्मांतरित व्यक्तियों के प्रवेश पर रोक लगाने वाले बोर्डों के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया। इस निर्णय को ग्राम सभाओं की बड़ी कानूनी जीत के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि कोर्ट ने उनके पक्ष को बरकरार रखा है।

यह विवाद कांकेर जिले की कई ग्राम पंचायतों से शुरू हुआ था, जहाँ बोर्ड लगाकर धर्म प्रचारकों के प्रवेश को प्रतिबंधित किया गया था। ग्राम सभाओं का तर्क था कि जबरन धर्मांतरण रोकने और अपनी स्थानीय संस्कृति व परंपराओं के संरक्षण के लिए यह कदम उठाया गया है। इससे पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी पेसा कानून का हवाला देते हुए कहा था कि ग्राम सभाएं अपनी सामाजिक संरचना की रक्षा के लिए ऐसे निर्णय ले सकती हैं। हाईकोर्ट के इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी, जिसे अब शीर्ष अदालत ने भी निरस्त कर दिया है।

मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि प्रवेश पर ऐसा प्रतिबंध असंवैधानिक है। वहीं केंद्र सरकार और छत्तीसगढ़ पंचायत विभाग ने ग्राम सभाओं की स्वायत्तता का समर्थन किया। अंततः सभी पक्षों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री विजय शर्मा ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह ग्राम सभाओं की जीत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों में पेसा कानून प्रभावी है और ग्रामीण अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए ऐसे कदम उठाने हेतु स्वतंत्र हैं। इस निर्णय के बाद अब आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभाओं की संवैधानिक शक्तियों और स्थानीय परंपराओं के संरक्षण को और अधिक बल मिलने की संभावना है।

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