Child Safety in Chhattisgarh: हर गांव में बनेगा बाल सुरक्षा का मजबूत तंत्र, सतर्कता समितियों के गठन की पहल

कोरबा में प्रभावित परिवार से मिलीं बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा, बच्चों की शिक्षा, सुरक्षा और पुनर्वास सुनिश्चित करने के दिए निर्देश

कोरबा/रायपुर। छत्तीसगढ़ में बच्चों की सुरक्षा को लेकर ग्राम और पंचायत स्तर पर निगरानी एवं सतर्कता व्यवस्था विकसित करने की पहल की जाएगी। इसके तहत ग्राम स्तरीय बाल संरक्षण एवं सतर्कता समितियों के गठन का प्रस्ताव तैयार किया जाएगा। छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने कोरबा में एक बालिका के साथ हुई गंभीर आपराधिक घटना और उसकी मृत्यु के मामले के बाद यह पहल किए जाने की बात कही।

डॉ. वर्णिका शर्मा ने प्रभावित परिवार से मुलाकात कर अपनी संवेदनाएं व्यक्त कीं। उन्होंने परिवार की वर्तमान परिस्थितियों और आवश्यक सहायता के बारे में जानकारी ली। साथ ही संबंधित अधिकारियों को परिवार के प्रति संवेदनशीलता बरतते हुए जरूरी सहयोग उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।

परिवार के अन्य बच्चे की शिक्षा और सुरक्षा पर विशेष ध्यान

आयोग अध्यक्ष ने जिला बाल संरक्षण अधिकारी को निर्देशित किया कि वे परिवार के निरंतर संपर्क में रहें। परिवार के अन्य बच्चे की शिक्षा निर्बाध रूप से जारी रखने के लिए आवश्यक शैक्षणिक और विधिक सहायता उपलब्ध कराने में विभागीय समन्वय सुनिश्चित किया जाए।

उन्होंने बच्चे की सुरक्षा, देखभाल और शिक्षा पर नियमित ध्यान देने को कहा। साथ ही स्पष्ट किया कि सहायता की पूरी प्रक्रिया में परिवार की गोपनीयता, गरिमा और संवेदनशीलता का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए।

बच्चों की सुरक्षा पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी

बच्चों के विरुद्ध बढ़ते अपराधों पर चिंता जताते हुए डॉ. शर्मा ने कहा कि प्रत्येक बच्चे को सुरक्षित, सम्मानपूर्ण और भयमुक्त वातावरण देना केवल परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

उन्होंने कहा कि पहले बच्चों की देखभाल और सुरक्षा में परिवार के साथ पड़ोस और समुदाय की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती थी। लेकिन एकल परिवारों के बढ़ते चलन और सामाजिक संपर्कों में कमी के कारण बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां बढ़ी हैं। ऐसे में समुदाय को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करने में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

ग्राम और पंचायत स्तर पर गठित होंगी बाल संरक्षण एवं सतर्कता समितियां

डॉ. शर्मा ने कहा कि बाल अपराधों की रोकथाम के लिए केवल घटना के बाद कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि जमीनी स्तर पर ऐसी व्यवस्था विकसित हो, जो संभावित जोखिमों की समय रहते पहचान कर सके।

इसी उद्देश्य से आयोग ग्राम एवं पंचायत स्तर पर ‘ग्राम स्तरीय बाल संरक्षण एवं सतर्कता समिति’ के गठन की पहल करेगा। इसके लिए संबंधित विभागों और स्थानीय निकायों के साथ समन्वय कर प्रस्ताव तैयार किया जाएगा।

प्रस्तावित समितियों में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, शिक्षकों, पंचायत प्रतिनिधियों, महिला स्व-सहायता समूहों की सक्रिय महिलाओं और अन्य जिम्मेदार सामुदायिक सदस्यों की सहभागिता सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाएगा।

इन समितियों का मुख्य उद्देश्य बच्चों की सुरक्षा से जुड़े जोखिमों की समय पर पहचान करना, संकटग्रस्त और सहायता की जरूरत वाले बच्चों को संबंधित सेवाओं से जोड़ना तथा किसी संभावित अपराध या गंभीर सुरक्षा संबंधी चिंता की सूचना तत्काल सक्षम अधिकारियों तक पहुंचाना होगा।

समितियों की भूमिका जागरूकता और सूचना देने तक सीमित

आयोग अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित समितियां बच्चों की सुरक्षा के लिए सामुदायिक सुरक्षा कवच के रूप में काम कर सकती हैं। इनके माध्यम से स्थानीय स्तर पर जागरूकता बढ़ेगी और जरूरत पड़ने पर पुलिस एवं प्रशासन को समय पर सूचना मिल सकेगी।

हालांकि, समितियों की भूमिका जागरूकता, सहयोग और समयबद्ध सूचना देने तक ही सीमित रहेगी। किसी अपराध की जांच, संदिग्ध व्यक्तियों के विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई और अन्य कानूनी प्रक्रिया संबंधित सक्षम प्राधिकारी ही करेंगे।

पीड़ित बच्चों की पहचान और गोपनीयता की सुरक्षा जरूरी

डॉ. वर्णिका शर्मा ने नागरिकों और मीडिया प्रतिनिधियों से अपील की कि बच्चों के विरुद्ध अपराधों से जुड़े मामलों में पूरी संवेदनशीलता और जिम्मेदारी बरतें। ऐसे मामलों में पीड़ित बच्चे की पहचान उजागर करने वाली तस्वीर, नाम, पता, परिवार की पहचान या अन्य विवरण किसी भी माध्यम से साझा नहीं किए जाने चाहिए।

उन्होंने पॉक्सो अधिनियम की धारा 23 और किशोर न्याय अधिनियम की धारा 74 के तहत पहचान उजागर करने से संबंधित प्रतिबंधों का पालन करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि बच्चों की गरिमा और गोपनीयता की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।

डॉ. शर्मा ने कहा कि बच्चों को संरक्षण, संवेदनशील व्यवहार और आवश्यक सहायता उपलब्ध कराना प्राथमिकता होनी चाहिए। परिवार, समाज, प्रशासन और प्रत्येक जागरूक नागरिक को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी बच्चे की सुरक्षा से जुड़े खतरे या उसके साथ होने वाले अन्याय की अनदेखी न हो।

उन्होंने कहा कि प्रयास ऐसा होना चाहिए कि हर बच्चा सुरक्षित रहे, उसकी शिक्षा बाधित न हो और उसे भयमुक्त वातावरण में अपना बचपन जीने का अवसर मिले।

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