महासमुंद के मोहन चंद्राकर बने नवाचार की मिसाल, नौकरी छोड़ खेती में उतरे और अब 300 किसानों को दे रहे नई राह
रायपुर, 18 अगस्त 2026। महासमुंद जिले के ग्राम केशवा निवासी मोहन चंद्राकर आज छत्तीसगढ़ में प्रगतिशील और नवाचारी किसान के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। एमबीए की पढ़ाई के बाद करीब 16 वर्षों तक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करने वाले मोहन चंद्राकर ने वर्ष 2013 में खेती का रुख किया और कृषि को व्यवसाय के रूप में विकसित करने का संकल्प लिया।
जैविक एवं प्राकृतिक खेती, पारंपरिक धान की किस्मों के संरक्षण, फसल विविधीकरण, प्रसंस्करण और किसानों को बाजार से जोड़ने के उनके प्रयासों ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है। उन्हें ‘राइस आइकॉन ऑफ इंडिया सम्मान’ और ‘नवाचार एवं प्रगतिशील किसान सम्मान’ से भी सम्मानित किया जा चुका है।
पारंपरिक और औषधीय फसलों को दे रहे बढ़ावा
मोहन चंद्राकर जैविक एवं प्राकृतिक पद्धति से खेती करते हुए पारंपरिक, सुगंधित और औषधीय गुणों वाली फसलों को बढ़ावा दे रहे हैं। उनके खेत में जावफूल, विष्णुभोग, जोहा, चखव, संजवनी, पीहू पर्पल राइस और काला गेहूं जैसी फसलों का उत्पादन किया जा रहा है।
खास बात यह है कि वे अपनी उपज के प्रसंस्करण से लेकर उसकी ब्रांडिंग और बाजार तक पहुंचाने का काम भी खुद कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने अपनी राइस मिल स्थापित की है और ‘तथास्तु – अच्छे लोग, अच्छा भोजन’ ब्रांड के माध्यम से उत्पादों को बाजार में पहुंचाया जा रहा है।
300 किसानों को जोड़ा, खेती से बाजार तक दे रहे मार्गदर्शन
मोहन चंद्राकर ने वर्ष 2017 में तथास्तु फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड (ऊर्जा कृषि एफपीओ) का गठन किया। इसके माध्यम से करीब 300 किसानों को जोड़ा गया है।
वे किसानों को आधुनिक कृषि तकनीक, फसल विविधीकरण, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और बाजार से जुड़ने के तरीके बताते हैं। इससे जुड़े कई किसानों को अपनी कृषि उपज का बेहतर मूल्य प्राप्त करने और आय बढ़ाने में मदद मिली है।
खरीफ 2026 में वे कृषि विज्ञान केंद्र महासमुंद और इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में पारंपरिक सुगंधित धान की किस्मों के पुनरुत्थान पर भी काम कर रहे हैं।
बंजर जमीन को बनाया हरियाली का क्षेत्र
मोहन चंद्राकर ने लगभग 6 एकड़ बंजर भूमि पर 400 ऑस्ट्रेलियन टीक के पौधे लगाए थे। आज ये पौधे 20 से 30 फीट तक ऊंचे हो चुके हैं।
वर्ष 2024 से उन्होंने सफेद चंदन के 200 पौधों के साथ आम, महुआ, जामुन, चीकू, अमरूद सहित विभिन्न फलदार और उपयोगी वृक्षों का रोपण एवं संरक्षण भी शुरू किया है।
उनका मानना है कि वृक्षारोपण आने वाली पीढ़ी के लिए फिक्स डिपॉजिट की तरह है। यही सोच उन्हें खेती के साथ पर्यावरण संरक्षण से भी जोड़ती है।
राष्ट्रीय स्तर पर मिला नवाचार को सम्मान
कृषि क्षेत्र में उनके प्रयोगों और नवाचार को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली है। वर्ष 2018 में आईसीएआर, नई दिल्ली में उन्हें श्रेष्ठ नवाचार करने वाले किसानों के साथ संवाद का अवसर मिला।
इसके बाद अप्रैल 2026 में ‘राइस आइकॉन ऑफ इंडिया सम्मान’ से नवाजा गया। वहीं 4 जून 2026 को रायपुर में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने उन्हें ‘नवाचार एवं प्रगतिशील किसान सम्मान’ प्रदान किया।
नौकरी से खेती तक का सफर बना प्रेरणा
मोहन चंद्राकर की कहानी सिर्फ एक किसान के सफल होने की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताती है कि आधुनिक शिक्षा, तकनीक, व्यवसायिक सोच और पारंपरिक कृषि ज्ञान को एक साथ जोड़कर खेती को लाभकारी व्यवसाय बनाया जा सकता है।
एमबीए की डिग्री से कॉर्पोरेट नौकरी तक और फिर खेतों में वापसी—मोहन चंद्राकर का यह सफर आज अनेक किसानों के लिए प्रेरणा बन रहा है।
