Muria Darbar 2026: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने की आदिवासी परंपराओं की सराहना, कहा— सामाजिक एकता और सुशासन का उत्कृष्ट उदाहरण है पारंपरिक व्यवस्था

जगदलपुर। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने ऐतिहासिक बस्तर दशहरा के अंतर्गत आयोजित मुरिया दरबार में आदिवासी समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था और सामूहिक निर्णय प्रणाली की सराहना की। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की परंपराएं सामाजिक एकता, न्याय, आपसी सहयोग और सुशासन का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि समय के साथ शासन व्यवस्था, नीतियों और कानूनों में बदलाव होते रहते हैं, लेकिन आदिवासी समाज ने अपनी परंपराओं, सामाजिक नियमों और अलिखित संविधान को पीढ़ियों से जीवित रखा है। यह व्यवस्था समाज में सुख-शांति, प्रेम, सद्भाव और सामूहिकता बनाए रखने का महत्वपूर्ण आधार है।

“मैं एक मांझी की बेटी हूं” — राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु

मुरिया दरबार में आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों और पारंपरिक प्रमुखों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने उन्हें अपनी संस्कृति और परंपराओं से दोबारा जुड़ने का अवसर देने के लिए आभार व्यक्त किया।

उन्होंने अपने पारिवारिक और सांस्कृतिक जुड़ाव का उल्लेख करते हुए कहा कि वह भी आदिवासी संस्कृति और परंपरा से आती हैं। राष्ट्रपति ने बताया कि उनके दादाजी मांझी थे, उनके पिताजी भी मांझी थे और उनके भाई भी मांझी हुआ करते थे। उन्होंने कहा, “मैं एक मांझी की बेटी हूं, गांव के मुखिया की बेटी हूं।”

राष्ट्रपति ने कहा कि उनके परिवार के सदस्य आज भले ही उनके बीच नहीं हैं, लेकिन अपनी संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था और परंपराओं के प्रति उनका जुड़ाव आज भी उतना ही गहरा है।

बदलते शासन के बीच पीढ़ियों से कायम हैं आदिवासी परंपराएं

राष्ट्रपति ने कहा कि देश में पहले राजाओं का शासन था, फिर अंग्रेजों का शासन आया और आज भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था है। समय के साथ शासन प्रणाली और कानून बदले हैं, लेकिन आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था आज भी कायम है।

उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था के कई नियम किसी पुस्तक में लिखे हुए नहीं हैं, फिर भी समाज के लोग पीढ़ियों से उनका पालन करते आ रहे हैं। लोग मिल-जुलकर पूजा-अर्चना करते हैं, विवाह और अन्य सामाजिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं तथा सामूहिक रूप से पर्व-त्योहार मनाते हैं।

नृत्य, गीत-संगीत और सामूहिक उत्सवों के माध्यम से आदिवासी समाज अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखता है। राष्ट्रपति ने इस विरासत को संरक्षित रखने के लिए समाज के लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया।

उन्होंने कहा कि संस्कृति, परंपरा, संविधान और लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का मूल उद्देश्य समाज में सुख-शांति, आनंद और प्रेम बनाए रखना है। इस दृष्टि से आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था महत्वपूर्ण है।

मांझी की भूमिका से गांवों में सुलझते हैं विवाद

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आदिवासी समाज की पारंपरिक न्याय व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि गांवों में मांझी और अन्य पारंपरिक प्रमुखों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

उन्होंने बताया कि परिवारों के बीच विवाद, जमीन-जायदाद से जुड़ी समस्याओं या आपसी मतभेदों की स्थिति में लोग मांझी के पास जाते हैं। मांझी गांव के लोगों को एकत्रित कर सभी पक्षों की बात सुनते हैं और आपसी सहमति से समस्याओं का समाधान निकालने का प्रयास करते हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि गांव के प्रमुख व्यक्तियों और बुजुर्गों की सहभागिता से सामूहिक निर्णय लेने की समृद्ध परंपरा आदिवासी समाज की विशेषता रही है।

पीड़ परगना और देश परगना की भी रही अहम भूमिका

राष्ट्रपति ने पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में पीड़ परगना और देश परगना जैसी संस्थाओं के महत्व का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि गांव स्तर पर किसी समस्या का समाधान नहीं होने पर उसे पीड़ परगना के समक्ष रखा जाता था। आवश्यकता पड़ने पर मामला देश परगना तक पहुंचाया जाता था।

इस व्यवस्था में संवाद, सामूहिक विचार-विमर्श और आपसी सहमति के माध्यम से समस्याओं को सुलझाने पर जोर दिया जाता था।

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