दिल्ली हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: 10 साल की सेवा से पहले नौकरी छोड़ी तो नहीं लौटेगा ट्रेनिंग का पैसा

नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्रीय सैन्य बलों में जवानों की नियुक्ति और प्रशिक्षण को लेकर एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अर्धसैनिक बलों में नियुक्त जवान को कम से कम 10 साल की सेवा देना अनिवार्य है। यदि कोई जवान स्वेच्छा से तय अवधि से पहले नौकरी छोड़ता है, तो प्रशिक्षण पर हुआ खर्च वापस नहीं किया जाएगा, क्योंकि एक सैनिक को तैयार करने में सरकारी खजाने से लाखों रुपये खर्च होते हैं।

जस्टिस बी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की खंडपीठ ने सीआईएसएफ में सब-इंस्पेक्टर के पद से इस्तीफा देने वाले एक उम्मीदवार की याचिका खारिज कर दी है। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि प्रशिक्षण के दौरान जमा कराई गई 2 लाख 57 हजार 544 रुपये की राशि उसे ब्याज सहित वापस दी जाए। अदालत ने इस मांग को अस्वीकार करते हुए कहा कि भर्ती, प्रशिक्षण और संसाधनों पर सरकार का भारी व्यय होता है, जिसकी भरपाई के बिना राशि लौटाना संभव नहीं है।

मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि याचिकाकर्ता ने पारिवारिक कारणों का हवाला देकर नौकरी छोड़ी थी, लेकिन वास्तव में उसने दूसरी सरकारी नौकरी (कनिष्ठ न्यायिक सहायक) मिल जाने के कारण इस्तीफा दिया था। अदालत ने इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि नियुक्ति के बाद भी दूसरे विकल्प तलाशना जिम्मेदारी के प्रति गैर-जिम्मेदाराना रवैया है। विभाग ने इस्तीफा स्वीकार करने से पहले उम्मीदवार की काउंसलिंग भी कराई थी, लेकिन वह अपने फैसले पर अडिग रहा।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया कि उम्मीदवार भर्ती के समय ही निर्धारित सेवा शर्तों और लिखित सहमति पत्र के माध्यम से इन नियमों को स्वीकार करता है। जमानत राशि जमा कराने का मुख्य उद्देश्य यही है कि प्रशिक्षित जवान कम से कम 10 वर्ष तक देश की सेवा करे। अदालत ने कहा कि स्वेच्छा से सेवा छोड़ने की स्थिति में सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग रोकने के लिए नियमों का पालन आवश्यक है और प्रशिक्षण शुल्क की वापसी का कोई कानूनी आधार नहीं बनता है।

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